"जल्लीकट्टू" पर पांच पर्सपेक्टिव
_______________________________________________
1) किसी भी रवायत पर यह कह देना भर काफ़ी नहीं है कि यह हमारी "कल्चर" है। क्योंकि "कल्चर" अपने आपमें कोई "एब्सोल्यूट वैल्यू" नहीं होती है, जिस पर कभी कोई सवाल ही नहीं उठाए जा सकते हों। वह हमेशा "इवॉल्व" होती रहती है, और होनी ही चाहिए। लिहाज़ा यह कहना कोई दलील नहीं कि यह हमारी सांस्कृतिक परंपरा है, इसलिए हम इसको जारी रखेंगे।
2) इसके साथ ही, ऐसा भी नहीं है कि "कल्चर" या "परंपरा" होनेभर से ही कोई चीज़ घृणित हो जाती है, जैसा कि हमारे "लिबरल" बंधुओं को लगता है। वास्तव में सांस्कृतिक परंपराओं का "लोकचेतना" में बड़ा महत्व है और "उत्तर-आधुनिकता" से लेकर "ओरियंटलिज़्म" तक की अनेक "थ्योरिटिकल स्टडीज़" का आशय लोकपरंपराओं को "सेलिब्रेट" करना ही रहा है। हालांकि, तब बस इतना भर देखना होता है कि कहीं ये परंपराएं हमारे "पर्यावास" को क्षति तो नहीं पहुंचा रही हैं।
3) "जल्लीकट्टू" के परिप्रेक्ष्य में उन लोगों का यह मनोरथ तो सुस्पष्ट है कि यह खेल उम्दा नस्ल के बैलों की पहचान करने के प्राथमिक मक़सद से खेला जाता है। तमिल ग्राम्य-जीवन की आर्थिकी भी इन बैलों के पोषण और विक्रय पर केंद्रित रहती है। फिर, उसमें लोकविनोद वाला क्रीड़ानुकूल भाव तो है ही। यानी, "जल्लीकट्टू" का प्राथमिक मक़सद किसी पशु को प्रताड़ित करके उस विनोद में सुख पाना नहीं है, जैसा कि "स्पैनिश बुलफ़ाइटिंग" में होता है, या किसी पशु को एक "काल्पनिक ईश्वर" को प्रसन्न कर देने के लिए क़त्ल कर देना नहीं है, जैसे कि एक संप्रदाय विशेष के एक "पिशाच-पर्व" के तहत व्यापक पैमाने पर होता है, या किसी "फ़ूड हैबिट" के "लोकतांत्रिक स्वातंत्र्य" के व्यवहार के चलते उसका भक्षण कर जाना नहीं है, जैसा कि "स्लॉटरहाउस" से लेकर आपकी "डायनिंग टेबल" तक एक रक्तपिंड को पहुंचाने वाले विश्व-व्यवहृत मांसाहार के तहत होता है।
4) और इसके बावजूद, ऐसा नहीं है कि "जल्लीकट्टू" के कारण पशुओं को किसी प्रकार का कष्ट ना होता हो। ठीक वैसे ही, जैसे इस उत्सव में सहभागिता करने वालों के सामने भी गंभीर रूप से ज़ख़्मी होने के ख़तरे हमेशा बने रहते हैं। हम उस दुनिया में जीते हैं, जहां पर कोई फिल्म प्रारंभ होने से पहले यह "डिस्क्लेमर" दिखाना आवश्यक होता है कि इस फिल्म के निर्माण की प्रक्रिया में किसी पशु को कष्ट नहीं पहुंचाया गया है, वहीं दूसरी ओर, पशुओं के साथ अंतहीन क्रूरताओं और हत्याओं का सिलसिला भी जारी रहता है। यह एक सुपरिचित मानवीय पाखंड है।
5) तिस पर मैं कहूंगा, अगर हम "एनिमल राइट्स" को लेकर इतने ही संवेदनशील हैं, तो इससे बढ़कर ख़ुशी की बात कोई दूसरी नहीं हो सकती और तब "जल्लीकट्टू" पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई ही जानी चाहिए। लेकिन, तब यह "सिलेक्टिव सिम्पैथी" नहीं होनी चाहिए और पशुओं के विरुद्ध होने वाले हर प्रकार के अत्याचारों और क्रूरताओं के विरुद्ध हमारा वही रुख़ रहना चाहिए। इसका आशय मांसाहार और बलिप्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। क्योंकि जो विवेक "कंसिस्टेंट" नहीं होता है, उसका दूसरा नाम "हिप्पोक्रेसी" होता है। और अलबत्ता मनुष्यता में "हिप्पोक्रेसी" के अस्तित्व पर भले मुझे रंचमात्र भी संदेह ना हो, लेकिन जगत के समक्ष उसकी पुष्टि होते देखना मेरे लिए संतोष का विषय अवश्य हमेशा से रहा आया है। अस्तु।
***
अंग्रेज़ी वेबदुनिया पर सुशोभित का ब्लॉग।
_______________________________________________
1) किसी भी रवायत पर यह कह देना भर काफ़ी नहीं है कि यह हमारी "कल्चर" है। क्योंकि "कल्चर" अपने आपमें कोई "एब्सोल्यूट वैल्यू" नहीं होती है, जिस पर कभी कोई सवाल ही नहीं उठाए जा सकते हों। वह हमेशा "इवॉल्व" होती रहती है, और होनी ही चाहिए। लिहाज़ा यह कहना कोई दलील नहीं कि यह हमारी सांस्कृतिक परंपरा है, इसलिए हम इसको जारी रखेंगे।
2) इसके साथ ही, ऐसा भी नहीं है कि "कल्चर" या "परंपरा" होनेभर से ही कोई चीज़ घृणित हो जाती है, जैसा कि हमारे "लिबरल" बंधुओं को लगता है। वास्तव में सांस्कृतिक परंपराओं का "लोकचेतना" में बड़ा महत्व है और "उत्तर-आधुनिकता" से लेकर "ओरियंटलिज़्म" तक की अनेक "थ्योरिटिकल स्टडीज़" का आशय लोकपरंपराओं को "सेलिब्रेट" करना ही रहा है। हालांकि, तब बस इतना भर देखना होता है कि कहीं ये परंपराएं हमारे "पर्यावास" को क्षति तो नहीं पहुंचा रही हैं।
3) "जल्लीकट्टू" के परिप्रेक्ष्य में उन लोगों का यह मनोरथ तो सुस्पष्ट है कि यह खेल उम्दा नस्ल के बैलों की पहचान करने के प्राथमिक मक़सद से खेला जाता है। तमिल ग्राम्य-जीवन की आर्थिकी भी इन बैलों के पोषण और विक्रय पर केंद्रित रहती है। फिर, उसमें लोकविनोद वाला क्रीड़ानुकूल भाव तो है ही। यानी, "जल्लीकट्टू" का प्राथमिक मक़सद किसी पशु को प्रताड़ित करके उस विनोद में सुख पाना नहीं है, जैसा कि "स्पैनिश बुलफ़ाइटिंग" में होता है, या किसी पशु को एक "काल्पनिक ईश्वर" को प्रसन्न कर देने के लिए क़त्ल कर देना नहीं है, जैसे कि एक संप्रदाय विशेष के एक "पिशाच-पर्व" के तहत व्यापक पैमाने पर होता है, या किसी "फ़ूड हैबिट" के "लोकतांत्रिक स्वातंत्र्य" के व्यवहार के चलते उसका भक्षण कर जाना नहीं है, जैसा कि "स्लॉटरहाउस" से लेकर आपकी "डायनिंग टेबल" तक एक रक्तपिंड को पहुंचाने वाले विश्व-व्यवहृत मांसाहार के तहत होता है।
4) और इसके बावजूद, ऐसा नहीं है कि "जल्लीकट्टू" के कारण पशुओं को किसी प्रकार का कष्ट ना होता हो। ठीक वैसे ही, जैसे इस उत्सव में सहभागिता करने वालों के सामने भी गंभीर रूप से ज़ख़्मी होने के ख़तरे हमेशा बने रहते हैं। हम उस दुनिया में जीते हैं, जहां पर कोई फिल्म प्रारंभ होने से पहले यह "डिस्क्लेमर" दिखाना आवश्यक होता है कि इस फिल्म के निर्माण की प्रक्रिया में किसी पशु को कष्ट नहीं पहुंचाया गया है, वहीं दूसरी ओर, पशुओं के साथ अंतहीन क्रूरताओं और हत्याओं का सिलसिला भी जारी रहता है। यह एक सुपरिचित मानवीय पाखंड है।
5) तिस पर मैं कहूंगा, अगर हम "एनिमल राइट्स" को लेकर इतने ही संवेदनशील हैं, तो इससे बढ़कर ख़ुशी की बात कोई दूसरी नहीं हो सकती और तब "जल्लीकट्टू" पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई ही जानी चाहिए। लेकिन, तब यह "सिलेक्टिव सिम्पैथी" नहीं होनी चाहिए और पशुओं के विरुद्ध होने वाले हर प्रकार के अत्याचारों और क्रूरताओं के विरुद्ध हमारा वही रुख़ रहना चाहिए। इसका आशय मांसाहार और बलिप्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। क्योंकि जो विवेक "कंसिस्टेंट" नहीं होता है, उसका दूसरा नाम "हिप्पोक्रेसी" होता है। और अलबत्ता मनुष्यता में "हिप्पोक्रेसी" के अस्तित्व पर भले मुझे रंचमात्र भी संदेह ना हो, लेकिन जगत के समक्ष उसकी पुष्टि होते देखना मेरे लिए संतोष का विषय अवश्य हमेशा से रहा आया है। अस्तु।
***
अंग्रेज़ी वेबदुनिया पर सुशोभित का ब्लॉग।
No comments:
Post a Comment